अल्बर्ट आइंस्टीन के “खुशी के सिद्धांत” पर विशेष।

अपने सापेक्षता के सिद्धांत E = mc2 के लिए प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्म जर्मनी में हुआ था। सैद्धांतिक भौतिकी में उनके योगदान को देखते हुए और ला ऑफ द फोटोइलेक्ट्रिक इफेक्ट की खोज के लिए उन्हें 1922 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 

इसके अलावा आइंस्टीन का जीवन को देखने का अपना एक नजरिया था जिसे खुशी का सिद्धांत के नाम से भी जाना जाता है। 

Albert Einstein

आइंस्टीन की जापान यात्रा। 

नवंबर 1922 में आइंस्टीन एक लेक्चर सीरीज के लिए यूरोप से जापान की यात्रा पर गए थे। आइंस्टीन जापान की राजधानी टोक्यो के इंपीरियल होटल में ठहरे हुए थे। होटल में उनका एक कोरियर आया। आइंस्टीन कोरियर लाने वाले को टिप देने लगे लेकिन उसने लेने से इनकार कर दिया। एक दूसरी रिपोर्ट के अनुसार आइंस्टीन के पास उस समय खुल्ले पैसे नहीं थे। आइंस्टीन नहीं चाहते थे कि कोरियर वाला खाली हाथ लौटे। 

जर्मन भाषा में एक वाक्य। 

आइंस्टीन ने होटल के पेड़ पर ही जर्मन भाषा में कोरियर वाले के लिए हस्ताक्षर सहित एक लाइन का नोट लिखा और उससे कहा अगर तुम भाग्यशाली निकले तो यह नोट तुम्हारे लिए किसी भी टिप्स से अधिक कीमती साबित होगा। 

आइंस्टीन ने लिखा था: “सफलता के पीछे भागने से लगातार बेचैनी हाथ लगती है जबकि शांत और सादगी से भरा जीवन अपने साथ ज्यादा खुशियां लाता है।” 

95 साल बाद सच साबित हुए आइंस्टीन के वाक्य। 

कोरियर वाले से कही गई आइंस्टीन की बात 95 साल बाद सच साबित हुई और खुशहाल जीवन के बारे में लिखा गया उनका यह नोट 2017 में रुपए 10 करोड़ से अधिक में नीलाम हुआ। इसे कुरियर वाले शख्स के भतीजे ने बेचा। इसी दौरान आइंस्टीन का लिखा दूसरा नोट भी तक़रीबन रुपया 2 करोड़ में बिका, जिस पर लिखा था, “जहां चाह वहां राह।”

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