10 मई 1857: प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम।

29 मार्च 1857 को भारतीय सिपाही मंगल पांडे ने एक ब्रिटिश अधिकारी पर गोली चला दी। अंग्रेजों ने मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल किया और 8 अप्रैल 1857 को उन्‍हें फांसी की सजा दे दी गई। इस घटना ने 10 मई 1857 के विद्रोह की नींव डाल दी थी।

1857 Ki kranti

चिंगारी।

ब्रिटिश सैनिक भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव करते थे। मेरठ में तैनात कुछ भारतीय सिपाहियों ने नए कारतूसों से फौजी अभ्‍यास करने से मना कर दिया। इन सिपाहियों का मानना था कि कारतूसों पर जानवरों की चर्बी का लप चढ़ा हुआ है। 9 मई 1857 को 85 भारतीय सैनिकों को अफसरों का हुक्‍म ना मानने के कारण नौकरी से निकाल दिया गया और उन्‍हें 10-10 साल की सजा सुनाई गई।

युद्ध का ऐलान।

19 मई 1857 को सिपाहियों ने मेरठ की जेल पर धावा बोलकर वहां बंद भारतीय सिपाहियों को आजाद करा लिया। विद्रोही सिपाहियों ने अंग्रज अफसरों पर हमला कर उन्‍हें मार गिराया। हथियारों पर कब्‍जा कर अंग्रेज की संपत्तियों को आग हवाले कर दिया गया। इस तरह अंग्रजों के खिलाफ युद्ध का ऐलान हो गया।

मेरठ से दिल्‍ली तक विद्रोह।

मेंरठ के कुछ सिपाहियों की टोली 10 मई की रात घोडों पर सवार होकर दिल्‍ली पहुंच गई। उन्‍हें देखकर दिल्‍ली में तैनात भारतीय सिपाहियों ने भी बगावत कर दी। भारतीय सिपाहियों ने हथियार व गोला बारूद कब्‍जे में लेकर इमरतों में आग लगा दी। विजयी सिपाही बहादुर शाह जफर से मिलने के लिए लाल किले के पास जमा हो गए।

बहादुर शाह जफर।

अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति करने वाले भारतीय सिपाही देश का शासन बहादुर शाह जफर को सौंपना चाहते थे। हालांकि, बहादुर शाह अंग्रेजों की भारी ताकत से टकराना नहीं चाहते थे। लेकिन सिपाही जबरन महल में घुस आए और आखिरकार बहादुर शाह काे यह मांग माननी पड़ी। बहादुर शाह ने देश के शासकों को चिटठी लिखकर अंग्रेजों के खिलाफ एक भारतीय राज्‍यों का संघ बनाने का आह्वान किया।

अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट हुआ देश। 

अब देश के लगभग हर रेजीमेंट के सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। विद्रोह के कुछ केंद्र थे- कानपुर, लखनऊ, अलीगढ़, आगरा, आरा, दिल्‍ली और झांसी। कस्‍बों और गांवों के लोग भी बागी होकर स्‍थानीय नेताओं, जमींदारों और मुखियाओं के पीछे संगठित हो गए, ये लोग अपनी सत्ता स्‍थापित करने और अंग्रेजों से लोहा लेने को तैयार थें।

अंग्रेज अपरजेय नहीं।

1857 के विद्रोह से साफ हो गया था कि अंग्रेज अपराजेय नहं है। सितंबर 1857 में दिल्‍ली दोबारा अंग्रेजों के कब्‍जे में आ गई लेकिन अगले 2 वर्षों तक उन्‍हें विद्रोह का सामना करना पड़ा। कुछ अन्‍य विद्रोहियों और नेताओं में रानी लक्ष्‍मीबाई, वीर कुंवर सिंह, बहादुर शाह, नाना साहिब, तातिया टोपे और बेगम हजरत महल शामिल थें।

विद्रोह का असर।

ब्रिटिश संसद में 1857 में एक नया कानून पारित कर ईस्‍ट इंडियां कंपनी के सारे अधिकार ब्रिटिश साम्राज्‍य को सौंप दिए ताकि भारतीय मामलों केा ज्‍यादा बेहतर ढंग से संभाला जो सके। देश के सभी शासकों को भरोसा दिया गया कि भविष्‍य में कभी भी उनकी जमीनों पर कब्‍जा नहीं किया जाएगा। अंग्रेजोंं ने फैसला किया कि वे भारत के लोगों को धर्म और सामाजिक रीत-रिवाजों का सम्‍मान करेंगें।
तारीख: 10/05/2022
लेखक: निशांत कुमार।             

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